राजस्थान के पश्चिमी इलाकों में डाकुओं से जुड़े कई पुराने किस्से आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इन्हीं में बाबा ओमपुरी का नाम भी सुनने को मिलता है। जैसलमेर के सकड़ा गांव से जुड़े ओमपुरी के बारे में कहा जाता है कि कम उम्र में ही उसके जीवन ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने उसे आगे चलकर डकैती की दुनिया में पहुंचा दिया। बताया जाता है कि महज 16 साल की उम्र में वह अपने पिता प्रतापपुरी को जेल से छुड़ाने के लिए पाकिस्तान तक पहुंच गया था। इसके बाद फलोदी और आसपास के इलाकों में उसकी डकैतियों, पुलिस से टकराव और आखिर में हुई मुठभेड़ से जुड़े कई किस्से सामने आते हैं। ओमपुरी को लेकर कुछ लोग उसे गरीबों की मदद करने वाला बताते हैं, जबकि कुछ लोग उसे खौफनाक डाकू के रूप में याद करते हैं।
ओमपुरी का जन्म जैसलमेर जिले के सकड़ा गांव में हुआ
कहा जाता है कि बाबा ओमपुरी का जन्म जैसलमेर जिले के सकड़ा गांव में हुआ था। गांव में एक पुराने कुएं को लेकर भी लोगों के बीच एक अलग ही मान्यता थी। कहा जाता था कि जो भी इस कुएं का पानी पीता था, वह आगे चलकर हिम्मती और ताकतवर बनता था। यहां तक कि कुछ लोग यह भी कहते है कि इस कुएं का पानी पीने वाले आगे चलकर डाकू बने। बाद में सरकार ने इस कुएं को बंद करवा दिया, ऐसी बात स्थानीय लोगों से सुनने को मिलती है। जिस जगह कुआं होने की बात कही जाती है, वहां बाद में पुलिस चौकी बनाए जाने का भी जिक्र मिलता है।
सकड़ा गांव में एक पुराने नीम के पेड़ का भी नाम लिया जाता है। स्थानीय लोगों के मुताबिक ओमपुरी डकैती करने के बाद इस पेड़ के आसपास रुककर आराम करता था। ओमपुरी के पिता का नाम प्रतापपुरी बताया जाता है और स्थानीय विवरण के अनुसार वह भी डाकू हुआ करते थे। करीब 1915 के आसपास प्रतापपुरी को पाकिस्तान में पकड़कर जेल में डाल दिए जाने की बात कही जाती है।
जब ओमपुरी को पिता के जेल जाने की खबर मिली तो उसने उन्हें छुड़ाने का फैसला कर लिया। उस समय उसकी उम्र करीब 16 साल बताई जाती है। उसने अपने भतीजे लालपुरी के साथ मिलकर योजना बनाई और दोनों ऊंट पर सवार होकर पाकिस्तान के लिए निकल पड़े। दो-तीन दिन के सफर के बाद दोनों जेल के पास पहुंचे। वहां की कड़ी सुरक्षा देखकर एक पल के लिए उन्हें वापस लौटने का विचार आया। लेकिन ओमपुरी ने सोचा कि अगर वह अपने पिता को ही नहीं छुड़ा पाया तो फिर लोग उससे कैसे डरेंगे। इसके बाद वह जेल के गेट तक पहुंचा। स्थानीय रूप से प्रचलित विवरण के अनुसार सुरक्षा कर्मचारियों ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन वह उनसे भिड़ गया और जेल के अंदर पहुंच गया। इसके बाद लोहे की सलाखें तोड़कर पिता को लेकर दोनों वापस सकड़ा आ गए। इसके बाद ओमपुरी का नाम इलाके में तेजी से फैलने लगा।
फलोदी में बढ़ा डकैतियों का खौफ
पिता को छुड़ाकर लौटने के बाद ओमपुरी का नाम धीरे-धीरे डकैतियों के साथ जुड़ता चला गया। बताया जाता है कि वह बड़े सेठों और व्यापारियों को निशाना बनाता था। उसके बारे में यह भी कहा जाता है कि लूट का कुछ पैसा वह गरीब लोगों में बांट देता था। इसी वजह से कुछ लोग उसे गरीबों का मददगार मानते थे। वहीं कई लोगों की नजर में वह सिर्फ एक डाकू था। ओमपुरी की गतिविधियों का सबसे ज्यादा जिक्र फलोदी इलाके से मिलता है। गाड़ियाला गांव में सेठ ताराचंद के यहां लूट की बात भी उसके नाम से जोड़ी जाती है। उसका कई स्थानीय प्रभावशाली लोगों और पुलिस अधिकारियों से विवाद होने की बात कही जाती है। इसी सिलसिले में दान सिंह रावलेत का नाम भी सामने आता है। उन्हें उस समय पुलिस अधिकारी बताया जाता है। भंवर मेघ सिंह को भी उस समय सीओ बताया जाता है। जाम्भा के सामंत और उनके परिवार के साथ ओमपुरी की दुश्मनी की बातें भी स्थानीय विवरण में मिलती हैं।
फलोदी के सीओ चौधरी ताराचंद का नाम भी ओमपुरी को पकड़ने की कोशिश से जोड़ा जाता है। बताया जाता है कि इलाके में लगातार हो रही लूटपाट के कारण पुलिस उसकी तलाश में लगी हुई थी। ओमपुरी की डकैती से जुड़ा एक चर्चित किस्सा तिलोक नाथ नाम के वणिक से भी जुड़ा है। एक दिन सुबह ओमपुरी अपने भतीजे लालपुरी के साथ डकैती के लिए निकला। लालपुरी ने उसे उस दिन बाहर नहीं जाने की सलाह दी, लेकिन ओमपुरी ने उसकी बात नहीं मानी। रास्ते में दोनों ने कुछ पणिहारियों से तिलोक नाथ का पता पूछा। महिलाओं ने सामने बनी हवेली की ओर इशारा कर दिया। दोनों वहां पहुंचे और तिलोक नाथ को आवाज लगाई। तिलोक नाथ डरते हुए नीचे आया। ओमपुरी ने उससे गुड़ मांगा। उसने गुड़ तौलकर दे दिया। इसके बाद ओमपुरी ने गुड़ कम या गलत तौलने की बात कही और विवाद हो गया। स्थानीय विवरण के अनुसार उसने तिलोक नाथ पर गोली चला दी। इसके बाद दोनों वहां रखा धन लेकर निकल गए।
पुलिस और ओमपुरी के बीच हुई आखिरी
लूट के बाद ओमपुरी और लालपुरी आगे निकल गए। कुछ दूर जाकर दोनों ने लूटा हुआ धन एक व्यक्ति के पास छिपा दिया। लेकिन उसी व्यक्ति ने बाद में पुलिस को उनके बारे में खबर कर दी। पुलिस को सूचना मिलते ही ओमपुरी और लालपुरी को पकड़ने की तैयारी शुरू हो गई। बड़ी संख्या में पुलिस और सेना के जवानों को उनके पीछे भेजा गया। दोनों को चारों तरफ से घेर लिया गया। ओमपुरी ने हथियार डालने के बजाय मुकाबला शुरू कर दिया। बताया जाता है कि उसने पुलिस के वाहनों पर भी गोलियां चलाईं। इसके बाद काफी देर तक दोनों तरफ से गोलीबारी हुई। स्थानीय विवरण के अनुसार इसी मुठभेड़ के दौरान ओमपुरी ने एक एसपी को भी गोली मार दी। लेकिन पुलिस और सेना के जवानों की संख्या ज्यादा थी। धीरे-धीरे ओमपुरी चारों तरफ से घिरता चला गया। कुछ समय बाद उसके पास गोलियां खत्म होने लगीं। उसने अपने भतीजे लालपुरी को वहां से निकल जाने के लिए कहा। लालपुरी वहां से निकल गया और ओमपुरी ने अपनी आखिरी गोली खुद को मार ली। पुलिस को जब उसकी मौत की पुष्टि हो गई तो शव को फलोदी ले जाया गया। वहां पंचनामा और चिकित्सकीय जांच किए जाने की बात कही जाती है। ओमपुरी के शरीर को लेकर भी एक हैरान करने वाला विवरण सुनने को मिलता है। बताया जाता है कि उसका वजन करीब 120 किलो था और उसकी छाती 52 इंच की थी। उसके हृदय का वजन करीब ढाई सेर बताया जाता है।
