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The History > Religion > नवरात्रि का पहला दिन !! मां शैलपुत्री का महत्व, कथा, पूजा विधि और मंत्र
Religion

नवरात्रि का पहला दिन !! मां शैलपुत्री का महत्व, कथा, पूजा विधि और मंत्र

Chetana Choudhary
Last updated: March 24, 2026 09:26
Chetana Choudhary - Written by
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Maa Shailputri Navdurga first form riding bull Navratri day 1 goddess
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नवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें नौ दिनों तक देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। यह पर्व पूरे भारत में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि के प्रत्येक दिन देवी के एक विशेष स्वरूप की पूजा की जाती है, जिन्हें सामूहिक रूप से नवदुर्गा कहा जाता है। इन नौ दिव्य रूपों में सबसे पहला स्वरूप मां शैलपुत्री का माना जाता है। नवरात्रि के पहले दिन उनकी पूजा की जाती है और इसी के साथ इस पवित्र पर्व की शुरुआत होती है।

Contents
मां शैलपुत्री का अर्थ और स्वरूपमां शैलपुत्री की कथामां शैलपुत्री की आरतीमां शैलपुत्री का धार्मिक महत्वमां शैलपुत्री की पूजामां शैलपुत्री का मंत्रमां शैलपुत्री को प्रिय भोगमां शैलपुत्री का प्रिय रंगमां शैलपुत्रीनवरात्रि के पहले दिन व्रत का महत्वमां शैलपुत्री का आध्यात्मिक संदेश

मां शैलपुत्री का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है-“शैल” और “पुत्री”। शैल का अर्थ है पर्वत और पुत्री का अर्थ है बेटी। इसलिए मां शैलपुत्री का अर्थ है पर्वत की पुत्री। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वे पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं और देवी पार्वती का ही एक रूप मानी जाती हैं। यही कारण है कि उन्हें नवदुर्गा का पहला स्वरूप कहा जाता है।

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करने का विशेष महत्व होता है। यह दिन नई शुरुआत, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक माना जाता है। भक्त इस दिन पूरे श्रद्धा भाव से माता की आराधना करते हैं और उनसे अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं। ऐसा माना जाता है कि मां शैलपुत्री की पूजा करने से व्यक्ति को मानसिक शक्ति, साहस और आत्मविश्वास प्राप्त होता है।

मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत दिव्य और शांत माना जाता है। वे वृषभ यानी बैल पर सवार रहती हैं और उनके हाथों में त्रिशूल तथा कमल का फूल होता है। उनका यह स्वरूप शक्ति और संतुलन का प्रतीक माना जाता है। उनकी आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है और व्यक्ति कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त करता है। नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना भी की जाती है, जिसे बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त अपने घरों और मंदिरों में कलश स्थापित करके देवी शक्ति का आह्वान करते हैं। इसके बाद नौ दिनों तक माता की पूजा, मंत्र जाप और भक्ति की जाती है। इस प्रकार नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री की पूजा के साथ आरंभ होकर भक्तों के जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार करता है।

मां शैलपुत्री का अर्थ और स्वरूप

मां शैलपुत्री नवदुर्गा का पहला स्वरूप हैं और नवरात्रि के पहले दिन उनकी पूजा की जाती है। “शैल” का अर्थ होता है पर्वत और “पुत्री” का अर्थ है बेटी। इसलिए शैलपुत्री का अर्थ हुआ पर्वत की पुत्री। पौराणिक ग्रंथों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं और उन्हें देवी पार्वती का प्रथम रूप माना जाता है। इसी कारण उन्हें देवी शक्ति का प्रारंभिक स्वरूप भी कहा जाता है।

मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत दिव्य, शांत और तेजस्वी माना जाता है। वे वृषभ यानी बैल पर सवार रहती हैं, इसलिए उन्हें वृषारूढ़ा देवी भी कहा जाता है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल होता है। त्रिशूल शक्ति और साहस का प्रतीक है, जबकि कमल पवित्रता और आध्यात्मिक जागरण का संकेत देता है। उनका चेहरा शांत और तेज से भरा होता है, जो भक्तों को मानसिक शांति और आत्मविश्वास प्रदान करता है।

मां शैलपुत्री का यह स्वरूप प्रकृति, स्थिरता और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वे पृथ्वी तत्व से जुड़ी हुई देवी हैं, इसलिए उनकी पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में संतुलन और स्थिरता आती है। यह भी माना जाता है कि मां शैलपुत्री की आराधना से जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति मिलती है और व्यक्ति के मन में साहस तथा आत्मबल का विकास होता है। नवरात्रि के पहले दिन भक्त मां शैलपुत्री की पूजा करके अपने जीवन की नई शुरुआत करते हैं। यह दिन सकारात्मक ऊर्जा और शुभ कार्यों के आरंभ का प्रतीक माना जाता है। भक्त देवी की आराधना करते समय उनसे सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना करते हैं।

मां शैलपुत्री की कथा

मां शैलपुत्री की पौराणिक कथा देवी सती और भगवान शिव से जुड़ी हुई है। यह कथा हिंदू धर्म में अत्यंत प्रसिद्ध है और नवरात्रि के महत्व को भी दर्शाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवी सती राजा दक्ष की पुत्री थीं। उन्होंने भगवान शिव को अपना पति चुना था, लेकिन उनके पिता राजा दक्ष भगवान शिव को पसंद नहीं करते थे।

एक बार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव और देवी सती को निमंत्रण नहीं भेजा। जब देवी सती को इस यज्ञ के बारे में पता चला तो उन्होंने बिना निमंत्रण के अपने पिता के यज्ञ में जाने का निर्णय लिया। भगवान शिव ने उन्हें वहां जाने से मना किया, लेकिन देवी सती अपने पिता के घर जाने के लिए तैयार हो गईं।

जब देवी सती यज्ञ स्थल पर पहुंचीं, तो वहां राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया। यह अपमान देवी सती सहन नहीं कर पाईं और उन्होंने क्रोधित होकर यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद देवी सती ने पुनर्जन्म लिया और पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया। इस जन्म में वे मां शैलपुत्री के रूप में जानी गईं। बाद में उन्होंने भगवान शिव को पुनः पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की और अंततः भगवान शिव से उनका विवाह हुआ। यह कथा हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति और प्रेम सफलता प्राप्त करता है।

मां शैलपुत्री की आरती

जय शैलपुत्री माता, मैया जय शैलपुत्री माता।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिव दाता॥

त्रिशूल कमल धारण, सिंहासन पर विराजे।
मस्तक चंद्र विराजे, चरणों में सब साजे॥

भक्तों की दुख हरती, करती सुख की वर्षा।
जो जन तुम्हें ध्यावे, पावे मन की इच्छा॥

वृषभ वाहन सोहे, शोभा अति न्यारी।
मां शैलपुत्री दयामयी, करती कृपा हमारी॥

दुर्गा रूप तुम्हारा, शक्ति का अवतारा।
तुम बिन जग में माता, कौन करे उद्धारा॥

जो कोई आरती गावै, मनवांछित फल पावे।
दुख दरिद्र मिट जावें, सुख संपत्ति घर आवे॥

जय शैलपुत्री माता, मैया जय शैलपुत्री माता।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिव दाता॥

मां शैलपुत्री का धार्मिक महत्व

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह दिन शक्ति, आस्था और नई शुरुआत का प्रतीक होता है। भक्त इस दिन पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव से माता की पूजा करते हैं और उनसे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। मां शैलपुत्री को पृथ्वी तत्व का प्रतीक माना जाता है। पृथ्वी स्थिरता, धैर्य और संतुलन का प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए उनकी पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और मानसिक संतुलन आता है। ऐसा माना जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से मां शैलपुत्री की आराधना करते हैं, उन्हें जीवन में सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है।

नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना भी की जाती है। यह अनुष्ठान देवी शक्ति के आह्वान का प्रतीक होता है। भक्त अपने घरों में कलश स्थापित करके माता दुर्गा का स्वागत करते हैं और नौ दिनों तक उनकी पूजा करते हैं। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, मंत्र जाप करते हैं और देवी दुर्गा की स्तुति करते हैं। इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन को शांति प्राप्त होती है।

मां शैलपुत्री की पूजा

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा विशेष विधि और श्रद्धा के साथ की जाती है। भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और स्वच्छ तथा सात्विक वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद पूजा स्थान को साफ करके वहां माता दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। सबसे पहले घट स्थापना की जाती है, जो नवरात्रि पूजा का महत्वपूर्ण भाग होता है। मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं और उसके ऊपर जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है। कलश के ऊपर आम के पत्ते और नारियल रखा जाता है। यह देवी शक्ति के आगमन का प्रतीक माना जाता है।

इसके बाद दीपक और धूप जलाकर माता की पूजा की जाती है। मां शैलपुत्री को फूल, फल और प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। कई भक्त इस दिन दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती और देवी मंत्रों का पाठ भी करते हैं। पूजा के अंत में माता की आरती की जाती है और प्रसाद वितरित किया जाता है। पूजा के दौरान मन को शांत और पवित्र रखना बहुत आवश्यक माना जाता है।

मां शैलपुत्री का मंत्र

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करते समय उनके विशेष मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मंत्र जाप करने से भक्तों को देवी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ इस मंत्र का जाप करते हैं, उनके जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और उन्हें मानसिक शांति प्राप्त होती है।

मां शैलपुत्री का प्रमुख मंत्र

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

इस मंत्र का अर्थ है कि हम उस देवी की वंदना करते हैं जो भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली हैं, जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है और जो वृषभ पर सवार होकर त्रिशूल धारण करती हैं। यह मंत्र भक्तों के जीवन में शक्ति और साहस का संचार करता है।

मां शैलपुत्री को प्रिय भोग

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री को विशेष भोग अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उन्हें शुद्ध घी का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि घी का भोग लगाने से भक्तों को स्वास्थ्य, ऊर्जा और दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

इसके अलावा भक्त माता को विभिन्न प्रकार के प्रसाद भी अर्पित करते हैं। इनमें दूध से बनी मिठाइयां, फल, गुड़ और हलवा विशेष रूप से प्रिय माने जाते हैं। कई लोग इस दिन खीर या मीठे पकवान भी बनाकर माता को अर्पित करते हैं। भोग लगाने के बाद प्रसाद को परिवार के सभी सदस्यों और अन्य भक्तों में बांटा जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा और खुशहाली का वातावरण बनता है। भोग अर्पित करते समय भक्तों को मन में श्रद्धा और भक्ति का भाव रखना चाहिए, क्योंकि सच्ची भक्ति से ही माता प्रसन्न होती हैं।

मां शैलपुत्री का प्रिय रंग

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री का प्रिय रंग पीला माना जाता है। इसलिए भक्त इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ मानते हैं। पीला रंग खुशहाली, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक होता है। यह रंग जीवन में नई शुरुआत और आशा का संकेत भी देता है।

नवरात्रि के पहले दिन मंदिरों और पूजा स्थलों को भी पीले फूलों से सजाया जाता है। भक्त मां शैलपुत्री को पीले फूल अर्पित करते हैं और उनसे अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। पीला रंग सूर्य की ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसे उत्साह और आशावाद का रंग भी कहा जाता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने से व्यक्ति के मन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास बढ़ता है।

मां शैलपुत्री

मां शैलपुत्री को आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण देवी माना जाता है। योग और ध्यान की परंपरा में उन्हें मूलाधार चक्र से जुड़ा हुआ माना जाता है। मूलाधार चक्र शरीर का पहला और आधारभूत ऊर्जा केंद्र होता है, जो स्थिरता, सुरक्षा और आत्मविश्वास से संबंधित होता है।

जब मूलाधार चक्र संतुलित और सक्रिय होता है तो व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और आत्मबल का विकास होता है। व्यक्ति मानसिक रूप से मजबूत बनता है और जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता प्राप्त करता है। मां शैलपुत्री की पूजा और ध्यान करने से यह ऊर्जा केंद्र सक्रिय होता है। इससे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आध्यात्मिक जागरण का अनुभव होता है। इस प्रकार मां शैलपुत्री केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं हैं, बल्कि वे आध्यात्मिक ऊर्जा और आत्मिक विकास का भी प्रतिनिधित्व करती हैं।

नवरात्रि के पहले दिन व्रत का महत्व

नवरात्रि के पहले दिन कई भक्त व्रत रखते हैं। व्रत रखने का उद्देश्य केवल धार्मिक परंपरा का पालन करना ही नहीं होता, बल्कि यह शरीर और मन को शुद्ध करने का एक माध्यम भी माना जाता है। इस दिन भक्त सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं और पूरे दिन माता दुर्गा की पूजा और भक्ति में समय बिताते हैं।

व्रत के दौरान भक्त सात्विक भोजन करते हैं और तामसिक भोजन से दूर रहते हैं। इस दिन फल, दूध, दही और मेवे का सेवन किया जाता है। कई लोग साबूदाना, सिंघाड़े का आटा और कुट्टू के आटे से बने व्यंजन भी खाते हैं।

व्रत रखने से शरीर को आराम मिलता है और मन में शांति का अनुभव होता है। इसके साथ ही यह व्यक्ति को अनुशासन और संयम का भी पाठ सिखाता है। नवरात्रि के पहले दिन व्रत रखने से भक्तों को मां शैलपुत्री की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से जीवन की कठिनाइयां दूर होती हैं और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

मां शैलपुत्री का आध्यात्मिक संदेश

मां शैलपुत्री का स्वरूप हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश देता है। उनका पहला संदेश है स्थिरता और धैर्य। जिस प्रकार पर्वत अडिग और स्थिर रहता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन में धैर्य और दृढ़ता बनाए रखनी चाहिए। कठिन परिस्थितियों में भी यदि व्यक्ति धैर्य और साहस से काम लेता है तो वह हर समस्या का समाधान खोज सकता है। मां शैलपुत्री का दूसरा संदेश है आत्मविश्वास और सकारात्मकता। जब व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति विश्वास रखता है और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ता है तो सफलता अवश्य प्राप्त होती है। देवी का त्रिशूल शक्ति और साहस का प्रतीक है, जो हमें यह याद दिलाता है कि हमें अपने जीवन की चुनौतियों से डरना नहीं चाहिए।

उनकी पूजा हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने जीवन में आध्यात्मिकता को महत्व देना चाहिए। जब व्यक्ति ईश्वर में विश्वास रखता है और भक्ति के मार्ग पर चलता है, तो उसे मानसिक शांति और संतोष प्राप्त होता है। इस प्रकार मां शैलपुत्री हमें धैर्य, साहस और सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं।

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