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The History > Religion > Navratri Day 9 !! माँ सिद्धिदात्री दिन पूजा विधि, कथा और सिद्धिदात्री का महत्व
Religion

Navratri Day 9 !! माँ सिद्धिदात्री दिन पूजा विधि, कथा और सिद्धिदात्री का महत्व

Chetana Choudhary
Last updated: March 27, 2026 18:55
Chetana Choudhary - Written by
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माँ सिद्धिदात्री का दिव्य स्वरूप, अष्ट सिद्धियों की दाता - नवरात्रि नौवां दिन महानवमी विशेष
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नवरात्रि के पावन त्यौहार का आज अंतिम दिन है महानवमी। नौ दिनों की अखंड भक्ति, उपवास और कठोर साधना के बाद, आज हम माँ दुर्गा के नौवें और अंतिम स्वरूप, माँ सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना पूरे विधि-विधान से करते हैं। यह दिन केवल एक उत्सव के समापन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह हमारी आध्यात्मिक यात्रा की पूर्णता और माँ की असीम कृपा प्राप्त करने का सर्वोच्च शिखर है।

Contents
माँ सिद्धिदात्री, सिद्धियों की दातामाँ सिद्धिदात्री दिव्य स्वरूप का वर्णनपौराणिक कथा जब त्रिदेवों ने माँ को पुकारामाँ सिद्धिदात्री की 8 सिद्धियां (अष्ट सिद्धियां)महानवमी पूजा विधि (नवरात्रि नौवां दिन)माँ सिद्धिदात्री की आरतीमाँ सिद्धिदात्री का आध्यात्मिक महत्वमां सिद्धिदात्री से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

महानवमी का दिन भक्त के धैर्य और श्रद्धा की परीक्षा का अंतिम पड़ाव होता है। पिछले आठ दिनों में हमने माँ के विभिन्न रूपों की आराधना की, अपने भीतर के विकारों को दूर किया और शक्ति का संचय किया। आज वही संचित शक्ति माँ सिद्धिदात्री के आशीर्वाद से ‘सिद्धि’ में परिवर्तित होती है। शास्त्रों में वर्णित है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से नवमी के दिन माँ की शरण में आता है, उसके जीवन से अज्ञानता का अंधकार मिट जाता है और उसे लौकिक व पारलौकिक दोनों प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।

आज के इस विशेष ब्लॉग में, हम माँ सिद्धिदात्री के दिव्य स्वरूप, उनकी प्रेरणादायक पौराणिक कथा, विस्तृत पूजा विधि, और इस दिन के गहरे आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से जानेंगे। यदि आप इस पावन दिन की महिमा को गहराई से समझना चाहते हैं और माँ को प्रसन्न करने के उपाय खोज रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए एक पूर्ण मार्गदर्शिका साबित होगा। आइए, माँ के चरणों में ध्यान लगाकर इस यात्रा को शुरू करें।

माँ सिद्धिदात्री, सिद्धियों की दाता

‘सिद्धिदात्री’ नाम अपने आप में ही पूर्णता का बोध कराता है। यह दो शब्दों के मेल से बना है: ‘सिद्धि’ (जिसका अर्थ है अलौकिक शक्ति, आध्यात्मिक पूर्णता या असाधारण सफलता) और ‘दात्री’ (प्रदान करने वाली)। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, माँ सिद्धिदात्री ब्रह्मांड की सभी प्रकार की सिद्धियों, सुख-समृद्धि, बुद्धि और अंततः मोक्ष प्रदान करने वाली सर्वोच्च देवी हैं। मार्कंडेय पुराण और देवी भागवत पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने भी अपनी समस्त अष्ट सिद्धियाँ माँ सिद्धिदात्री की कठोर तपस्या करके ही प्राप्त की थीं। माँ की असीम अनुकंपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ, जिसके कारण वे लोक में ‘अर्धनारीश्वर’ के नाम से विख्यात हुए। यह तथ्य हमें यह सिखाता है कि पुरुष और प्रकृति, या शिव और शक्ति एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं। माँ सिद्धिदात्री की शक्ति इतनी अपार है कि उनकी एक मंद मुस्कान से ही साधक के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और वह परम पद का अधिकारी बन जाता है। वे भक्तों के लिए करुणा की सागर हैं।

माँ सिद्धिदात्री दिव्य स्वरूप का वर्णन

माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप अत्यंत भव्य, सौम्य और दिव्य तेज से ओत-प्रोत है। उनका वर्ण प्रभात के सूर्य की भांति तेजस्वी है। वे सुनहरे रंग के दिव्य परिधान और बहुमूल्य आभूषण धारण करती हैं। माँ एक विकसित कमल के फूल पर सुखपूर्वक विराजमान हैं, जो पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक है, हालांकि कुछ स्थानों पर उन्हें सिंह पर भी सवार दिखाया जाता है।

माँ की चार भुजाएं हैं, जो जीवन के चार पुरुषार्थों और दिशाओं का संचालन करती हैं:

  1. दाहिनी ओर की ऊपरी भुजा:– इसमें माँ ने ‘गदा’ धारण की है, जो अधर्म के विनाश और अनुशासन का प्रतीक है।
  2. दाहिनी ओर की निचली भुजा:– इसमें ‘चक्र’ है, जो समय की निरंतरता और ब्रह्मांडीय व्यवस्था को दर्शाता है।
  3. बाईं ओर की ऊपरी भुजा:– इसमें ‘शंख’ है, जिसकी ध्वनि विजय और मंगल का उद्घोष करती है।
  4. बाईं ओर की निचली भुजा:– इसमें ‘कमल का फूल’ है, जो कीचड़ (संसार) में रहकर भी अलिप्त रहने की प्रेरणा देता है।

उनका यह शांत मुखमंडल और शस्त्रों से सजी भुजाएं हमें संदेश देती हैं कि वे भक्तों के भय को दूर कर उन्हें जीवन में संतुलन, साहस और पूर्णता प्रदान करती हैं।

पौराणिक कथा जब त्रिदेवों ने माँ को पुकारा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब चारों ओर केवल अंधकार था, तब एक विशाल ऊर्जा पुंज प्रकट हुआ। वह ऊर्जा पुंज साक्षात माँ आदि शक्ति का रूप था। जब भगवान शिव ने समस्त ब्रह्मांड की सिद्धियों को प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने युगों तक माँ की तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माँ आदि शक्ति ने सिद्धिदात्री के रूप में अवतार लिया और भगवान शिव को अष्ट सिद्धियों से पूर्ण किया।

एक अन्य कथा के अनुसार, जब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) ने इस विराट सृष्टि की रचना, पालन और संहार की योजना बनाई, तो उन्हें इसके संचालन के लिए अपार शक्ति, बुद्धि और कला की आवश्यकता महसूस हुई। इसके बिना शून्य से कुछ भी सृजित करना असंभव था। तब तीनों देवों ने मिलकर माँ आदि शक्ति की स्तुति की। त्रिदेवों की करुण पुकार और प्रार्थना सुनकर, माँ आदि शक्ति ने अपने सबसे कल्याणकारी रूप ‘माँ सिद्धिदात्री’ के रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए। माँ सिद्धिदात्री ने प्रकट होकर ब्रह्मा जी को सृष्टि की रचना करने की रचनात्मक शक्ति, भगवान विष्णु को संसार का पालन-पोषण करने की स्थिरता और भगवान शिव को तामसिक प्रवृत्तियों का अंत करने के लिए संहार की सिद्धियां प्रदान कीं। माँ ने ही उन्हें बताया कि वे सब उनके ही अंश हैं। माँ की कृपा पाकर ही तीनों देव अपने कार्यों में सक्षम हुए। इस प्रकार, माँ सिद्धिदात्री ने न केवल ब्रह्मांड की रचना में आधारभूत भूमिका निभाई, बल्कि उन्होंने यह भी स्थापित किया कि समस्त ज्ञान, कौशल और सिद्धियां अंततः उन्हीं की चेतना से उत्पन्न होती हैं। वे ही संपूर्ण जगत की जननी और संचालिका हैं।

माँ सिद्धिदात्री की 8 सिद्धियां (अष्ट सिद्धियां)

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, माँ सिद्धिदात्री अपने भक्तों को आठ विशिष्ट सिद्धियां प्रदान करती हैं। इन सिद्धियों का वर्णन हनुमान चालीसा में भी अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता के रूप में आता है। ये सिद्धियां केवल चमत्कार नहीं, बल्कि चेतना की उच्चतम अवस्थाएं हैं:-

  1. अणिमा:– यह वह शक्ति है जिससे साधक अपने शरीर को अणु के समान सूक्ष्म (छोटा) बना सकता है।
  2. महिमा:– इस सिद्धि के द्वारा व्यक्ति अपने शरीर को असीमित रूप से विशाल और फैला हुआ बना सकता है।
  3. गरिमा:– इस सिद्धि से शरीर का भार इतना बढ़ाया जा सकता है कि उसे स्वयं देवता भी हिला न सकें।
  4. लघिमा:– यह शरीर को रुई की तरह भारहीन (हल्का) बनाने की शक्ति है, जिससे व्यक्ति हवा में उड़ सकता है।
  5. प्राप्ति:– इस सिद्धि से साधक किसी भी स्थान पर स्थित वस्तु को मानसिक शक्ति से प्राप्त कर सकता है और पशु-पक्षियों की भाषा समझ सकता है।
  6. प्राकाम्य:– इसका अर्थ है अपनी इच्छा शक्ति को इतना प्रबल कर लेना कि पृथ्वी की गहराई से लेकर आकाश की ऊंचाई तक कुछ भी असंभव न रहे।
  7. ईशित्व:– यह ईश्वरत्व प्राप्त करने की शक्ति है। इसके द्वारा व्यक्ति प्रकृति के तत्वों पर अपना शासन स्थापित कर सकता है।
  8. वशित्व:– यह सभी को अपने अनुकूल बनाने या वश में करने की शक्ति है, जिससे क्रोध और द्वेष समाप्त हो जाते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से, इन सिद्धियों का अर्थ अहंकार का विसर्जन और आत्म-साक्षात्कार है। जब साधक इन आठों सिद्धियों को पार कर लेता है, तो वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होकर माँ के चरणों में विलीन हो जाता है।

महानवमी पूजा विधि (नवरात्रि नौवां दिन)

महानवमी की पूजा नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह साधना की पूर्णाहुति का दिन है। यहाँ इसकी विस्तृत चरण-दर-चरण विधि दी गई है:

  1. स्नान और संकल्प:– ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की सफाई करें और पवित्र स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो बैंगनी या सुनहरे रंग के) धारण करें। हाथ में जल लेकर नौ दिनों के व्रत की पूर्णता और परिवार के कल्याण का संकल्प लें।
  2. कलश और गणेश पूजन:– माँ की पूजा से पहले कलश देव, गणेश जी, वरुण देव और नवग्रहों का पूजन करें। उन्हें धूप, दीप और गंध अर्पित करें।
  3. माँ सिद्धिदात्री का अभिषेक:– माँ की प्रतिमा को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। उन्हें नए वस्त्र, लाल फूलों की माला (कमल या गुड़हल विशेष प्रिय है) और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
  4. तिलक और सुगंध:– माँ को कुमकुम, सिंदूर और अक्षत का तिलक लगाएं। सुगंधित धूप और शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  5. विशिष्ट भोग:– माँ सिद्धिदात्री को नारियल, सूजी का हलवा, काले चने और पूरी का भोग अत्यंत प्रिय है। इसे पीतल या चांदी के पात्र में अर्पित करना शुभ माना जाता है।
  6. मंत्र और पाठ:– “ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः” मंत्र का जप करें। दुर्गा सप्तशती के नौवें अध्याय का पाठ करना इस दिन विशेष फलदायी होता है।
  7. हवन (महत्वपूर्ण):– नवमी पर हवन के बिना नवरात्रि अधूरी मानी जाती है। हवन कुंड तैयार कर “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा” मंत्र के साथ आहुतियां दें। अंत में नारियल की पूर्ण आहुति दें।
  8. कन्या (कंजक) पूजन:– 2 से 10 वर्ष की नौ कन्याओं और एक बालक (बटुक) को घर बुलाएं। उनके पैर धोकर उन्हें आसन पर बिठाएं। उन्हें हलवा-पूरी, चने और उपहार दें। उनके चरणों का आशीर्वाद लें क्योंकि उनमें साक्षात माँ दुर्गा का वास होता है।
  9. आरती और पारण:– माँ की कपूर से आरती करें और सभी में प्रसाद बांटें। इसके बाद स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें।

माँ सिद्धिदात्री की आरती

जय सिद्धिदात्री माँ, तू सिद्धि की दाता।

तुझको पूजे ऋषि-मुनि, सुर-नर और ज्ञाता॥

चार भुजाएं तेरी, सिंहासन तेरा प्यारा।

सबके बिगड़े काम बनाए, माँ तेरा सहारा॥

दाएं हाथ में गदा-चक्र, बाएं में शंख-कमल।

तेरी छवि निराली माँ, तू है बड़ी निर्मल॥

जो भी ध्यान लगाए माँ, सब फल वह पावे।

दुःख दरिद्र कट जाए, जो शरण तेरी आवे॥

महानवमी का पावन दिन, महिमा तेरी गाएं।

भक्तों पर कृपा करना माँ, हम शीश नवाएं॥

माँ सिद्धिदात्री का आध्यात्मिक महत्व

नवरात्रि का नौवां दिन चेतना के शिखर पर पहुँचने का दिन है। यह दर्शाता है कि नौ दिनों की निरंतर तपस्या, इंद्रिय संयम और अनन्य भक्ति के बाद, एक साधक उस अवस्था को प्राप्त करता है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है। माँ सिद्धिदात्री की पूजा हमें सिखाती है कि सच्ची सफलता केवल बैंक बैलेंस या भौतिक सुखों में नहीं है, बल्कि अपने भीतर की सुप्त शक्तियों (Kundalini) को जागृत करने में है। यह दिन हमें ‘अहं’ से ‘वयं’ (मैं से हम) और फिर ‘तत्वमसि’ (वह ब्रह्म तू ही है) की ओर ले जाता है। माँ की कृपा से साधक के जीवन में संतोष का भाव आता है। जब मन शांत और इंद्रियाँ वश में होती हैं, तभी असली सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। माँ सिद्धिदात्री का आशीर्वाद हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर आत्मज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है, जिससे हमारा जीवन सुगंधित और शांत हो जाता है।

जय माँ सिद्धिदात्री ! जय माता दी !

मां सिद्धिदात्री से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. माँ सिद्धिदात्री की पूजा किस दिन की जाती है?

माँ सिद्धिदात्री की पूजा चैत्र या शारदीय नवरात्रि के नौवें दिन यानी महानवमी के दिन की जाती है।

2. माँ सिद्धिदात्री को कौन सा भोग प्रिय है?

माँ सिद्धिदात्री को नारियल, सूजी का हलवा, काले चने और पूरी का भोग सबसे प्रिय माना जाता है।

3. अष्ट सिद्धियां क्या हैं जो माँ प्रदान करती हैं?

माँ सिद्धिदात्री अपने भक्तों को आठ सिद्धियां प्रदान करती हैं: अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व।

4. भगवान शिव को अर्धनारीश्वर रूप कैसे प्राप्त हुआ?

भगवान शिव ने माँ सिद्धिदात्री की तपस्या करके दिव्य सिद्धियां प्राप्त की थीं। उसी कृपा से उनका आधा शरीर देवी का हो गया और वे अर्धनारीश्वर कहलाए।

5. माँ सिद्धिदात्री का पसंदीदा रंग कौन सा है?

माँ सिद्धिदात्री की पूजा में जामुनी (Purple) या सुनहरे (Golden) रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है।

6. नवमी के दिन कन्या पूजन का क्या महत्व है?

नवमी के दिन कन्याओं को माँ दुर्गा का साक्षात स्वरूप माना जाता है। कन्या पूजन से नवरात्रि व्रत पूर्ण होता है और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

7. माँ सिद्धिदात्री का बीज मंत्र क्या है?

माँ सिद्धिदात्री का मुख्य बीज मंत्र है: “ॐ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः” या “ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः”।

8. क्या महानवमी के दिन हवन करना जरूरी है?

हाँ, नवरात्रि की नौ दिनों की साधना की पूर्णता के लिए महानवमी के दिन हवन करना अत्यंत शुभ और आवश्यक माना जाता है।

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