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गिरल लिग्नाइट माइंस विवाद, कंपनी ने बताया पूरा सच आखिर क्या है पूरा मामला

Jogendar Choudhary
Last updated: May 26, 2026 08:17
Jogendar Choudhary
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गिरल लिग्नाइट माइंस विवाद से जुड़ी इन्फोग्राफिक इमेज जिसमें खनन कार्य, आंदोलन और कंपनी पक्ष दिखाया गया है
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राजस्थान के बाड़मेर क्षेत्र में स्थित गिरल पावर प्लांट और उससे जुड़ी लिग्नाइट माइंस पिछले कुछ समय से विवादों और आंदोलनों के कारण चर्चा में बनी हुई हैं। इस पूरे मामले में अब मेसर्स श्री मोहनगढ़ कंस्ट्रक्शन कंपनी की ओर से भी विस्तृत पक्ष सामने आया है। कंपनी के प्रतिनिधि श्री मनोहर सिंह पाबड़ा के अनुसार इस विवाद को केवल स्थानीय रोजगार के मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करना वास्तविक स्थिति का अधूरा चित्र है। कंपनी का कहना है कि मामला रोजगार से अधिक कार्य बाधा, अवैध दबाव और हड़ताल अवधि के भुगतान की मांग से जुड़ा हुआ है। कंपनी के अनुसार राजस्थान स्टेट माइंस एंड मिनरल्स लिमिटेड (RSMML) द्वारा लगभग एक वर्ष पूर्व उसे लिग्नाइट खनन एवं परिवहन कार्य का ठेका विधिवत प्रक्रिया के तहत प्रदान किया गया था। इस ठेके के अंतर्गत जालेला और गिरल नामक दो माइंस में खनन कार्य किया जाना था। कार्यादेश प्राप्त होने के बाद कंपनी ने योजनाबद्ध तरीके से दोनों स्थानों पर कार्य प्रारंभ किया।

Contents
आंदोलन, धरनाऔर काम बंद होने के बाद बढ़ा तनावकंपनी नेअदालत का दरवाजा क्यों खटखटायास्थानीय लोगों से कंपनी कि अपील

कंपनी ने जालेला माइंस में अपनी स्वयं की मशीनरी लगाकर कार्य शुरू किया, जबकि गिरल माइंस में शुरुआती चरण में दूसरी कंपनी की किराये की मशीनरी के माध्यम से संचालन किया जा रहा था। कंपनी का दावा है कि दोनों माइंस में कार्य पूरी तरह RSMML के नियमों और सरकारी दिशानिर्देशों के अनुरूप किया जा रहा था। साथ ही स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार भी दिया गया था। शुरुआत में कार्य सामान्य रूप से चलता रहा, लेकिन समय के साथ गिरल माइंस में कई प्रकार की परेशानियां सामने आने लगीं। कंपनी के अनुसार वहां कार्यरत मशीनरी संचालक को बार-बार स्थानीय विवादों, हड़तालों, कार्य बाधा और अन्य व्यावसायिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। इन परिस्थितियों से परेशान होकर मशीनरी संचालक ने अंततः कार्य बीच में ही बंद कर दिया और अपनी मशीनें माइंस क्षेत्र से हटा लीं। यहीं से विवाद की स्थिति गंभीर होने लगी। मशीनरी हटने के कारण गिरल माइंस में खनन कार्य अस्थायी रूप से रुक गया। इससे वहां कार्यरत कुछ स्थानीय श्रमिकों और वाहन मालिकों का काम प्रभावित हुआ। हालांकि कंपनी का कहना है कि यह केवल अस्थायी स्थिति थी और नई मशीनरी की व्यवस्था होते ही कार्य दोबारा शुरू किया जाना प्रस्तावित था।

कंपनी का दावा है कि प्रभावित लोगों को स्पष्ट रूप से बताया गया था कि लगभग 15 से 20 दिनों के भीतर नई मशीनरी लगाकर उन्हें पुनः कार्य में शामिल कर लिया जाएगा। इसके बावजूद हालात सामान्य होने के बजाय और अधिक तनावपूर्ण हो गए। कंपनी के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी दी गई थी ताकि किसी प्रकार का भ्रम या विवाद उत्पन्न न हो।

आंदोलन, धरनाऔर काम बंद होने के बाद बढ़ा तनाव

कंपनी के प्रतिनिधि श्री मनोहर सिंह पाबड़ा के अनुसार गिरल माइंस में उत्पन्न स्थिति को लेकर शिव विधायक Ravindra Singh Bhati से भी बातचीत हुई थी। कंपनी का कहना है कि उन्हें फोन पर पूरी स्थिति से अवगत कराया गया और यह आश्वासन दिया गया कि नई मशीनरी उपलब्ध होते ही स्थानीय लोगों को पुनः रोजगार दिया जाएगा। लेकिन कंपनी के मुताबिक बातचीत के अगले ही दिन घटनाक्रम ने अचानक नया मोड़ ले लिया। जालेला माइंस, जहां कंपनी की अपनी मशीनरी कार्यरत थी और जहां किसी प्रकार की तकनीकी या संचालन संबंधी समस्या नहीं थी, वहां पहुंचकर कार्य रुकवा दिया गया। इसके बाद माइंस के बाहर धरना शुरू हो गया और धीरे-धीरे आंदोलन का स्वरूप व्यापक होता चला गया। कंपनी का आरोप है कि आंदोलन के कारण न केवल खनन कार्य पूरी तरह बंद हो गया, बल्कि कोयला परिवहन से जुड़े सभी कार्य भी प्रभावित हो गए। स्थिति को देखते हुए कंपनी ने विरोध टालने और कानून व्यवस्था बिगड़ने से बचाने के लिए स्वेच्छा से पूरा कार्य रोक दिया। इसके साथ ही सरकार, जिला प्रशासन और RSMML अधिकारियों को पूरे घटनाक्रम की जानकारी दे दी गई।

खनन और परिवहन कार्य बंद होने का सबसे बड़ा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा। कंपनी के अनुसार लगभग 500 वाहन, जो कोयला परिवहन में लगे हुए थे, पिछले डेढ़ महीने से बंद पड़े हैं। इन वाहनों पर निर्भर ड्राइवरों, मालिकों और मजदूरों की आय पूरी तरह प्रभावित हुई है। इसके अलावा माइंस में कार्यरत हजारों श्रमिक, तकनीकी कर्मचारी और अन्य स्टाफ भी बेरोजगार जैसी स्थिति में पहुंच गए हैं। कंपनी का कहना है कि आंदोलन के कारण केवल कंपनी ही प्रभावित नहीं हुई, बल्कि अनेक ऐसे लोग भी नुकसान झेल रहे हैं जिनका आंदोलन से कोई सीधा संबंध नहीं है। कई परिवारों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां धीमी हो गई हैं। कंपनी ने यह भी कहा कि यदि कार्य लंबे समय तक बंद रहता है तो इसका प्रभाव राज्य सरकार के राजस्व पर भी पड़ता है। लिग्नाइट खनन और परिवहन से सरकार को मिलने वाला राजस्व प्रभावित होता है, जिसका असर व्यापक आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।

इसी दौरान आंदोलन में हड़ताल अवधि के भुगतान की मांग प्रमुख रूप से सामने आने लगी। कंपनी के अनुसार हड़ताल पर बैठे कुछ लोगों द्वारा बिना कार्य किए वेतन अथवा भुगतान की मांग की जा रही है। कंपनी का कहना है कि यही वह मांग है जिसे वह पूरी तरह अव्यावहारिक और अवैध मानती है।

कंपनी नेअदालत का दरवाजा क्यों खटखटाया

मेसर्स श्री मोहनगढ़ कंस्ट्रक्शन कंपनी का कहना है कि उसने पूरे विवाद के दौरान प्रशासनिक स्तर पर समाधान निकालने का प्रयास किया। कंपनी के अनुसार उसने स्थानीय स्तर पर बातचीत, जनप्रतिनिधियों से संवाद और अधिकारियों को सूचना देने जैसे सभी कदम उठाए, लेकिन इसके बावजूद कार्य शुरू नहीं हो सका।जब स्थिति लगातार बिगड़ती गई और कार्य पूरी तरह ठप हो गया, तब कंपनी ने मजबूर होकर न्यायालय की शरण लेने का निर्णय लिया। कंपनी का कहना है कि वह केवल वही कार्य कर रही थी जिसके लिए उसे वैधानिक रूप से ठेका दिया गया था। ऐसे में बिना किसी कानूनी आधार के कार्य बाधित होना उसके लिए गंभीर आर्थिक और व्यावसायिक संकट बन गया। कंपनी के मुताबिक न्यायालय ने उसके पक्ष को सुनने के बाद राहत प्रदान की। हालांकि अदालत से राहत मिलने के बावजूद कंपनी का कहना है कि वह किसी टकराव या बलपूर्वक कार्रवाई के पक्ष में नहीं है। कंपनी चाहती है कि स्थानीय नागरिकों की सहमति और सहयोग के साथ शांतिपूर्ण तरीके से कार्य दोबारा शुरू हो। लेकिन कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि कुछ मांगें ऐसी हैं जिन्हें स्वीकार करना संभव नहीं है। कंपनी का कहना है कि यदि हड़ताल पर बैठे लोगों को बिना कार्य किए भुगतान किया जाता है तो यह एक गलत परंपरा की शुरुआत होगी। इससे भविष्य में किसी भी औद्योगिक परियोजना या सरकारी कार्य में अनावश्यक दबाव और अवरोध पैदा हो सकते हैं।

कंपनी ने यह सवाल भी उठाया है कि यदि भुगतान करना पड़े तो उसका आधार क्या होगा। क्या केवल आंदोलन में शामिल लोगों को भुगतान किया जाएगा या उन सभी कर्मचारियों, ड्राइवरों, वाहन मालिकों और मजदूरों को भी जिनका कार्य बंद होने से नुकसान हुआ है। कंपनी का कहना है कि इस स्थिति में हजारों लोग प्रभावित हुए हैं और किसी एक समूह को विशेष भुगतान देना उचित नहीं होगा। इसके अलावा कंपनी ने यह भी कहा कि उसके कार्य को बिना कारण बाधित किया गया, जिससे करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ। मशीनरी बंद रही, परिवहन रुका और परियोजना की गति प्रभावित हुई। ऐसे में कंपनी को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा, यह भी एक बड़ा प्रश्न है।

स्थानीय लोगों से कंपनी कि अपील

पूरे विवाद के बीच मेसर्स श्री मोहनगढ़ कंस्ट्रक्शन कंपनी ने स्थानीय नागरिकों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। कंपनी का कहना है कि उसने पिछले एक वर्ष में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार दिया है और आगे भी रोजगार देने के लिए तैयार है। कंपनी का दावा है कि उसका उद्देश्य केवल व्यावसायिक लाभ कमाना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देना भी है। कंपनी के अनुसार खनन कार्य से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। ऐसे में लंबे समय तक कार्य बंद रहने से सबसे अधिक नुकसान आम लोगों को ही होता है। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी भी प्रकार की अवैध वसूली, दबाव राजनीति या हफ्ता वसूली जैसी गतिविधियों को स्वीकार नहीं करेगी। कंपनी का कहना है कि व्यवसाय में लाभ और हानि दोनों होते रहते हैं, लेकिन बार-बार दबाव बनाकर कार्य बाधित करना किसी भी स्थिति में उचित नहीं माना जा सकता। कंपनी के अनुसार कुछ लोग व्यक्तिगत स्वार्थ, ईर्ष्या या दबाव की राजनीति के चलते माहौल खराब करने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि कंपनी हमेशा सरकारी नियमों और जनहित के अनुसार कार्य करती रही है। अंत में कंपनी ने स्थानीय नागरिकों से अपील की है कि वे किसी के बहकावे में आए बिना विकास कार्यों में सहयोग करें। कंपनी का कहना है कि उसके दरवाजे स्थानीय लोगों के लिए हमेशा खुले हैं और रोजगार से जुड़ी हर उचित मांग पर बातचीत की जा सकती है। लेकिन कानून और नियमों से बाहर जाकर किसी प्रकार का दबाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। कंपनी ने यह संदेश भी दिया कि यदि प्रशासन और न्यायालय के निर्देशानुसार कार्य शुरू करने की स्थिति बनती है, तो वह पूरी जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ खनन कार्य दोबारा शुरू करेगी। साथ ही स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध रहेगी।

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