भारत में हुनर की कोई कमी नहीं है। गांव हो या शहर, आज भी लाखों लोग अपने हाथों के हुनर से रोजी-रोटी कमाते हैं। कोई लकड़ी का सामान बनाता है, कोई लोहे का काम करता है, कोई कपड़े सिलता है, तो कोई मिट्टी से बर्तन और दूसरी चीजें तैयार करता है। इनमें से बहुत से काम ऐसे हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चले आ रहे हैं।
परेशानी यह है कि हुनर होने के बावजूद हर कारीगर के पास अच्छे औजार, नई तकनीक सीखने का मौका या अपने बनाए सामान को बड़े बाजार तक पहुंचाने की सुविधा नहीं होती। कई लोग छोटा काम करते हैं और पूंजी की कमी के कारण उसे आगे नहीं बढ़ा पाते। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना शुरू की।
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना कब शुरू हुई
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना की शुरुआत 17 सितंबर 2023 को की गई थी। इस योजना को खास तौर पर उन पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों के लिए बनाया गया है जो अपने हाथों और औजारों से काम करते हैं। योजना के लिए सरकार ने ₹13,000 करोड़ का प्रावधान रखा है और इसे वित्त वर्ष 2023-24 से 2027-28 तक लागू करने की योजना है। सरल शब्दों में कहें तो इसका उद्देश्य सिर्फ कारीगर को आर्थिक मदद देना नहीं है। कोशिश यह है कि उसका पारंपरिक हुनर बना रहे, काम करने का तरीका बेहतर हो और वह अपने काम को आगे बढ़ाकर ज्यादा कमाई कर सके।
इस योजना को शुरू करने की जरूरत क्यों पड़ी
कई पारंपरिक कारीगरों की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं होती कि उन्हें काम नहीं आता। समस्या यह होती है कि उनके पास काम को बड़े स्तर पर ले जाने के साधन नहीं होते। मान लीजिए कोई बढ़ई कई वर्षों से फर्नीचर बना रहा है। उसके पास अनुभव तो है, लेकिन पुराने औजारों के कारण काम में ज्यादा समय लगता है। इसी तरह कोई लोहार अच्छा सामान बना सकता है, लेकिन आधुनिक उपकरणों की कमी उसके काम की गति और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर सकती है।
दूसरी तरफ बाजार भी बदल चुका है। अब सिर्फ सामान बनाना काफी नहीं है। उसे सही ग्राहक तक पहुंचाना, डिजिटल तरीके से भुगतान लेना, अपने उत्पाद की पहचान बनाना और नए बाजार से जुड़ना भी जरूरी हो गया है। PM Vishwakarma योजना इसी पूरी जरूरत को ध्यान में रखकर बनाई गई है। इसमें पहचान से लेकर प्रशिक्षण, औजार और ऋण तक कई स्तरों पर सहायता देने की व्यवस्था की गई है।
अब तक कितने लोगों को इसका फायदा मिला
यह सिर्फ कागज पर बनी योजना नहीं रह गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1 दिसंबर 2025 तक करीब 30 लाख लाभार्थी योजना में पंजीकृत हो चुके थे और 23.09 लाख से ज्यादा लाभार्थियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका था। मार्च 2026 में PIB द्वारा जारी जानकारी में भी बताया गया कि योजना ने अपने 30 लाख लाभार्थियों के पंजीकरण का लक्ष्य दो साल के भीतर पूरा कर लिया, जबकि इसके लिए मूल रूप से पांच साल की अवधि रखी गई थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि योजना का दायरा कितना बड़ा है और देश के अलग-अलग हिस्सों में पारंपरिक काम करने वाले कितने लोग इससे जुड़ रहे हैं।
किन लोगों को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना का फायदा मिल सकता है
यह योजना हर व्यक्ति के लिए नहीं है। इसका लाभ उन्हीं लोगों को मिल सकता है जो सरकार द्वारा निर्धारित 18 पारंपरिक व्यवसायों में से किसी एक से जुड़े हैं और पात्रता की शर्तें पूरी करते हैं।
इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:-
- बढ़ई
- नाव बनाने वाले
- लोहार
- हथौड़ा और टूल किट बनाने वाले
- ताला बनाने वाले
- सुनार
- कुम्हार
- मूर्तिकार और पत्थर से जुड़े कारीगर
- मोची और जूते बनाने वाले
- राजमिस्त्री
- टोकरी, चटाई और झाड़ू बनाने वाले
- पारंपरिक खिलौना बनाने वाले
- नाई
- माला बनाने वाले
- धोबी
- दर्जी
- मछली पकड़ने का जाल बनाने वाले
इन 18 पारंपरिक trades को योजना में शामिल किया गया है।
क्या सिर्फ कारीगर होना ही काफी है
नहीं। किसी व्यक्ति का इन कामों में से किसी एक से जुड़ा होना जरूरी है, लेकिन इसके साथ योजना की दूसरी पात्रता शर्तें भी पूरी करनी होती हैं। योजना का फोकस ऐसे कारीगरों और शिल्पकारों पर है जो पारंपरिक काम अपने हाथों और औजारों से करते हैं। यह काम आम तौर पर स्वरोजगार के रूप में किया जाता है। पात्र लाभार्थियों को योजना के तहत PM Vishwakarma Certificate और ID Card के जरिए पहचान भी दी जाती है। पंजीकरण CSC के माध्यम से biometric authentication के जरिए किया जाता है और सरकारी जानकारी के अनुसार registration के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता।
कारीगरों को योजना से किस तरह मदद मिलती है
इस योजना की खास बात यही है कि इसमें सहायता का सिर्फ एक रास्ता नहीं रखा गया है। किसी कारीगर को पहले अपने हुनर की पहचान और प्रशिक्षण मिल सकता है। इसके बाद उसे आधुनिक औजारों की जरूरत हो तो toolkit incentive की सुविधा है। अपना काम बढ़ाने के लिए credit support का रास्ता भी रखा गया है। प्रशिक्षण के दौरान ₹500 प्रतिदिन का stipend दिया जाता है और toolkit के लिए ₹15,000 तक की सहायता का प्रावधान है। योजना में collateral-free credit support भी शामिल है। यानी योजना का विचार कुछ ऐसा है कि कारीगर सिर्फ आर्थिक मदद लेकर वहीं न रुक जाए, बल्कि अपने काम को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाने में सक्षम हो।
इस योजना का सबसे बड़ा फायदा किसे हो सकता है
अगर कोई व्यक्ति वर्षों से पारंपरिक काम कर रहा है लेकिन उसके पास आधुनिक औजार नहीं हैं, तो उसके लिए toolkit support उपयोगी हो सकता है। अगर किसी कारीगर को अपने काम में सुधार करने या नई तकनीक सीखने की जरूरत है, तो training मददगार हो सकती है। और अगर कोई व्यक्ति अपना छोटा काम बढ़ाना चाहता है लेकिन पूंजी की कमी है, तो योजना के तहत उपलब्ध credit support उसके लिए उपयोगी हो सकता है। इसके अलावा सरकार कारीगरों को बाजार और डिजिटल लेनदेन से जोड़ने पर भी जोर देती है। इसका उद्देश्य यह है कि कारीगर सिर्फ उत्पादन तक सीमित न रहे, बल्कि अपने उत्पाद को बेहतर तरीके से बाजार तक पहुंचा सके। पारंपरिक कारीगरों का काम केवल कमाई का जरिया नहीं है। इससे देश की पुरानी कला, स्थानीय शिल्प और पीढ़ियों से चली आ रही कई परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं। इसलिए अगर किसी कारीगर को बेहतर औजार, प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार मिल जाता है तो उसका फायदा केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। उसके परिवार की आय, उसके छोटे कारोबार और उस पारंपरिक हुनर को भी आगे बढ़ने का मौका मिलता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना को पारंपरिक कारीगरों को आधुनिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की एक महत्वपूर्ण पहल के तौर पर देखा जा रहा है।
